तुमको जी लिया मैंने


तुमको इस तरह जी लिया मैंने
कि खुदको तुममें बुना लिया मैंने
लिख दिये कई गीत और गजल
जिन्हें चाहता से चुरा लिया मैंने
इस तरह तुमको लिखा साथी
खुद को शुरो में पिरो लिया मैंने
तुम अल्फाज़ो से इस तरह मिली
तुमको अहसासों में डुबो लिया मैंने
जब तुमने मुझें गाया था हँसकर
तो प्यार का देवता गढ़ लिया मैंने
मुझ अधूरे को तुमने पूरा बनाया
तो ख़ुद को प्रीत में मढ़ लिया मैंने
मैं लिखता रहा तुझे हमेशा साथी
और जज्बातों में बहा लिया मैंने
कभी प्रकृति की अनुपम कृति लिखी
तो पथ्थर की मूरत में गढ़ लिया मैंने
लिखकर तुझे अमृत का प्याला
तुमको अपने होंठो से लगा लिया मैंने
कभी तो बेशुमार मोहबत से मेहबूब
तो कभी नाराज़गी से लिख लिया मैंने
ओस की बूंद बनकर जब बिखरी तो
खुद क़ो बौछारों में भिगो लिया मैंने
बन गई तुम जब कोई लिहाफ मेरा
तो तुमको ऊपर बिछा लिया मैंने
खत के साथ भेजी चुनर में तुझे देख
अपने माथे की सोभा बना लिया मैंने
कभी सखी बनाई तो कभी सहचरी
बाद में उसको प्रियतमा बना लिया मैंने
ऋषभ मोहबत का उसे देवता बना
सजदे में सिर झुका लिया मैने
वो कोई और नही जाँ तुम ही तो हो
जिसको सिर का ताज बना लिया मैंने
खुद को अंधेरो के हवाले करके साथी
तुमको चाँदी सा मेहताब लिया मैंने

ऋषभ तोमर

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