जिन्दगी एक सफर

“रफ्तार का नाम सफर है, धूप से तपती एक डगर है. थक कर बैठें प्लेटफॉर्म के नीचे, सूकून पा लें आँखें मीचें. अब वो प्यारे जगहा किधर हैं? लौटकर आ जा लोहे वाले ‘शेड’ इधर हैं!! दोपहर के 3,बज रहे…

मैं मन का करता हूँ

आजकल मैं मन का करता हूँ। चुपचाप दिल में झाकां करता हु नजरे चुराता हुं और रूह को गुलजार की नज़्मों से सेंकता हूँ। हर सुबह तुम्हे भीगे बालों को संवारता देखता हु इत्मीनान से मुस्कुराता हूँ बेजुबां चुप्पी से…

कभी बेवजह मुस्कुराया करो

बेवक़्त ही बेबात कभी बेवजह मुस्कुराया करो कुम्हला चुके जो कोंपल ज़िम्मेदारियों की धूप में उनके चेहरे को हंसी दे जाया करो झुलसे से लगते हैं वो सहते थपेड़े ज़िन्दगी के मुरझाने लगा बचपन पीछे छूट गए सपने उनके सपनों…

विकराल मकड़जाल

विकराल मकड़जाल नादान जीव फंसे मकड़जाल बिना सूझबूझ हुए सब शिकार अंजान डगर भौंचक सा जाल ललचाये सबको पर है कराल.. बड़े सुंदर धागों का ये जाल आकर्षण का ये डाले पाश परलोभन की ये है मिसाल जो निकट गए…

Posts navigation